क्षेत्रीय अस्मिता का कार्ड भाजपा  की सही काट ? क्षेत्रीय अस्मिता का कार्ड भाजपा  की सही काट ?
(अजय बोकिल) वरिष्ठ संपादक‘राइट क्लिक’ क्या भाजपा के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की सही काट केवल क्षेत्रीय अस्मिता कार्ड ही है? यह सवाल इसलिए, क्योंकि... क्षेत्रीय अस्मिता का कार्ड भाजपा  की सही काट ?


(अजय बोकिल) वरिष्ठ संपादक
‘राइट क्लिक’

क्या भाजपा के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की सही काट केवल क्षेत्रीय अस्मिता कार्ड ही है? यह सवाल इसलिए, क्योंकि पश्चिम बंगाल में भाजपा की आक्रामक राजनीति से परेशान राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अब ‘बंगाल गौरव’ का कार्ड चल दिया है। ममता दी को उम्मीद है कि पांच माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में तीसरी बार अपनी सत्ता बचाने का यही आखिरी उपाय है। यह बात इसलिए भी अहम है कि महाराष्ट्र में डेढ़ साल पहले तक भाजपा की सहयोगी रही शिवसेना भी एनसीपी और कांग्रेस के साथ बनाई अपनी सरकार को इसी क्षेत्रीय अस्मिता की ढाल से बचाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। इस ढाल में छेद करने की भाजपा की तमाम कोशिशें अब तक तो नाकाम रही हैं। जाहिर है कि भाजपा को उन राज्यों में सत्ता तक पहुंचने में कठिनाई आ रही है, जहां क्षेत्रीय या स्थानीय पहचान का मुद्दा बहुत प्रभावी है या हो सकता है।
‘बिहार विजय’ के बाद भाजपा (एनडीए) का राजनीतिक अश्व सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल में दौड़ने की फिराक में है। गौरतलब है कि अप्रैल-मई 2021 में देश के पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें से असम में भाजपा सत्ता में वापसी के लिए चुनाव लड़ रही है तो तमिलनाडु में वह ‘किंगमेकर’ बनना चाहती है। केरल में उसका लक्ष्य मुख्य विपक्षी पार्टी बनना है और पांडिचेरी छोटा सा राज्य है। असली सत्ता संग्राम पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है, जहां भाजपा ने ममता दी और उनकी पार्टी की कई तरफ से घेराबंदी कर दी है। इसका सबसे बड़ा कारण 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और केन्द्र में सत्तासीन भाजपा के वोट बैंक में मात्र 3 फीसदी का अंतर रह जाना है। केन्द्रीय मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय राज्य में भाजपा की ताकत को लगातार बढ़ाने में लगे हैं। ममता के कई सहयोगी और तृणमूल नेता अब भाजपा की अोर देख रहे हैं। यही नहीं, लेफ्ट का कैडर भी दक्षिणपंथी कही जाने वाली भाजपा की तरफ मुड़ रहा है। भाजपा ने जो राजनीतिक चक्रव्यूह रचा है, उसमें ‍िपछले दो विधानसभा चुनावों में ममता के पक्ष में वोट करने वाला राज्य का मुस्लिम वोटर अगले चुनाव में कितना ममता दी के साथ रहेगा, कहना मुश्किल है। दरअसल एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन औवेसी द्वारा ममता को साथ में चुनाव लड़ने का न्यौता भी एक दूरगामी रणनीति का हिस्सा है, जिसका ‍अंतिम लाभ भाजपा को ही ‍िमलना है। ममता की चिंता यही है कि जो भाजपा 2016 के विधानसभा चुनाव में 16 फीसदी वोट लेकर महज 3 सीटें जीत पाई थी, वही भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य में 40.64 प्रतिशत वोट लेकर 18 सीटें ले गईं। इसके विपरीत कभी 34 साल तक लगातार सत्ता में रहा सीपीएम के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा मात्र 6.34 फीसदी ही वोट ले पाया। उसे एक भी सीट नहीं मिली। इस चुनाव में कांग्रेस को दो सीटें जरूर मिलीं, लेकिन उसका वोट शेयर मात्र 5.67 रहा, जो लेफ्ट से भी कम था।
कुल मिलाकर लेफ्ट की खाली हो रही इस जमीन पर अब भाजपा भगवा फसल काटने की तैयारी में है। हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे अलग-अलग होते हैं। लेकिन लोकसभा की हवा भाजपा विधानसभा तक कायम रख पाई तो यह मानना पड़ेगा कि सेक्युलरवाद से राष्ट्रवाद की अोर बंगाल के राजनीतिक कायांतरण में ममता राज के दस साल संक्रमण काल की तरह गिने जाएंगे। क्योंकि अगले चुनाव में 3 प्रतिशत वोट का भाजपा के पक्ष में स्विंग कराना बहुत कठिन नहीं है। खासकर तब, जब राज्य में राजनीतिक हिंसा बहुत बड़ा मुद्दा बन गई हो, ममता के एकाधिकारवाद के चलते उनके कई साथी पार्टी छोड़ रहे हों और ममता दी के डगमग सेक्युलरवाद की हिंदुत्ववादी भाजपा से सीधी मुठभेड़ की स्थिति बन रही हो। वैसे भी भाजपा के पास कैडर और संसाधनों की कमी नहीं है। हाल में ममता के खास माने जाने वाले परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा बगावत का झंडा बुलंद करना मायने रखता है। चर्चा है कि चुनाव के पहले शुभेंदु भाजपा में जा सकते हैं। व्यापक जमीनी पकड़ वाले शुभेंदु पार्टी में ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते दखल से नाराज बताए जाते हैं। कुछ और सांसद भी ममता दी से नाखुश है। जबकि भाजपाई खेमे में लड़ने की जिद ज्यादा है। ऐसे में अगर भाजपा बंगाल में सरकार बनाने की स्थिति में आती है तो यह उसके लिए ‘त्रिपुरा विजय’ से भी बड़ी खुशी होगी।
शायद इसीलिए ममता बैनर्जी ने अब हिंदुत्व के हमलों और राज्य में कुशासन के भाजपा के तीरों का जवाब ‘बंगाल गौरव’ से देने की शुरूआत कर दी है। इसी के तहत उन्होंने भाजपा को ‘बाहरी पार्टी’ कहना शुरू कर ‍िदया है और मैदान में बंगाली रंगमंच के जाने-पहचाने चेहरे ब्रात्य बसु को मैदान में उतार दिया है। ममता के समर्थक ब्रात्य ने बीजेपी पर हमला करते हुए सवाल उठाए कि उसने केन्द्र में बंगाल के अपने किसी सांसद को कैबिनेट मंत्री क्यों नहीं बनाया? क्या हालात इतने खराब है कि बंगाली गैरबंगालियों के आगे झुक जाएं? ब्रात्य ने कहा कि बंगाल से बाहर रहने वाले बंगालियों को ‘बाहरी’ ही माना जाता है। कांग्रेस में भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस को त्रिपुरी कांग्रेस में हरवाने की कोशिश की गई थी। वही अब ममता बैनर्जी के साथ दोहराया जा रहा है। ममता दी ऐसी ही ताकतों के साथ लड़ रही हैं। ब्रात्य ने यह सवााल किया कि क्या यूपी और गुजरात का एक भी आदमी बं‍गालियों की तरह अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए फांसी चढ़ा? इन हमलों का जवाब पश्चिम बंगाल भाजपा प्रदेशाध्यक्ष दिलीप घोष ने यह कहकर देने की कोशिश की कि भाजपा (पूर्व में जनसंघ) की स्थापना एक बंगाली डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने की थी। लेकिन खुद तृणमूल कांग्रेस ने बं‍गालियों के लिए क्या किया? भाजपा ममता पर मुस्लिमपरस्त होने के आरोप भी लगा रही है।
दरअसल ममता की यह रणनीति महाराष्ट्र में शिवसेना की ‘मराठी माणूस’ वाली राजनीति से मेल खाती है। जब-जब भाजपा शिवसेना की गर्दन पकड़ती है, तब-तब वो यही मुद्दा उछाल कर बच निकलती है। क्योंकि मराठी माणूस, मराठी अस्मिता, मराठी भाषा के सवाल पर भाजपा बैकफुट पर आ जाती है। यह हमने सुशांत प्रकरण में भी देखा। जब शिवसेना ने मुंबई पुलिस को महाराष्ट्र के गौरव के साथ जोड़ा तो महाराष्ट्र के भाजपा नेता मौन साध गए, केवल राष्ट्रीय नेतृत्व बोलता रहा। शिव सेना पर भाजपा नेताअों के हमलों के जवाब में संजय राउत ने तल्खी भरा ट्वीट किया था- ‘मुंबई मराठी माणूस के ही बाप की है। जिन्हें यह बात मान्य नहीं वह अपना बाप दिखाएं। शिवसेना महाराष्ट्र के ऐसे दुश्मनों का श्राद्ध किए बिना नहीं रुकेगी।‘ मराठी माणूस की अस्मिता के नाम पर शिव सेना ने गैर मराठी लोगों के साथ हिंसा करने में भी संकोच नहीं किया। निश्चय ही यह मुद्दा मराठी मानस को कहीं न कहीं प्रभावित करता है। वैसे पश्चिम बंगाल में भाजपा का दावा तो राज्य में विधानसभा की 294 में से 200 सीटें जीतने का है। हालांकि भाजपा के पास राज्य में कोई भी ऐसा चेहरा नहीं है, जिसे ममता के विकल्प के रूप में देखा जा सके। लेकिन वह वोटों के ध्रुवीकरण और ममता के किलों में सेंध लगाने का काम सुनियोजित ढंग से कर रही है। इसका परिणाम पंचायत चुनाव में भी दिखा है।
उधर ममता का भी मानना है कि बंगाल में भाजपा की तोपों के मुंह बंद कराने का यही अंतिम उपाय है। कितना कारगर होगा, अभी कहना मुश्किल है। क्योंकि ममता के साथ दस साल की एंटी इनकम्बेंसी भी जुड़ी है। साथ ही तृणमूल कांग्रेस के साथ वो दिक्कत तो है ही,जो इस देश में अधिकांश व्यक्ति केन्द्रित पार्टियों से साथ रही है। ये पार्टियां व्यक्तियों के उत्थान के साथ ही परवान चढ़ती हैं और उनका अवसान भी व्यक्तियों के पतन के साथ होने लगता है। क्योंकि ये पार्टियां एकाधिकारवाद से ही संचालित होती है। सपा, ,बसपा,राजद जैसी पार्टियां अब इसी ढलान पर हैं। कल को शिव सेना भी इसी राह पर जा सकती है। कांग्रेस में विचारधारा पर परिवारवाद हावी है तो लेफ्ट में समयानुकूल बदलाव के अभाव में उनका आखिरी किला केरल भी कितने दिन बच पाता है, यह देखना ‍िदलचस्प होगा। बहरहाल ममता ने हिंदुत्व का जवाबी कार्ड चल दिया है, ऐसे में बंगाली गौरव भी हिंदुत्व में समाहित हो जाएगा या फिर अपनी अलग पहचान कायम रखेगा, इसकी परीक्षा आगामी विधानसभा चुनाव में हो जाएगी।

प्रस्तुति यस पी चौवे


Times Todays News

No comments so far.

Be first to leave comment below.

Your email address will not be published. Required fields are marked *