उनके तो हालात ना पूछो तो अच्छा उनके तो हालात ना पूछो तो अच्छा
जमीर अहमद अयोध्या भेलसर।किसी भी देश के विकास में मजदूरों की सबसे बड़ी भूमिका है। ये मजदूर ही हैं जिनके खून-पसीने से विकास की... उनके तो हालात ना पूछो तो अच्छा

जमीर अहमद

अयोध्या

भेलसर।
किसी भी देश के विकास में मजदूरों की सबसे बड़ी भूमिका है। ये मजदूर ही हैं जिनके खून-पसीने से विकास की प्रतीक गगनचुंबी इमारतों की तामीर होती है। ये मजदूर ही हैं जो खेतों में काम करके अनाज पैदा करते हैं। आलीशान इमारत को चमकाने का काम भी यही मजदूर करते हैं। काम के अभाव में उन्ही मजदूरों के चहरे पर चिंता की लकीरें पड़ गई है।
दो वक्त की रोटी के लिए दर-दर भटकना इन मजदूरों की नियति बन गयी है। बावजूद इसके इनके समक्ष काम के लाले पड़े रहते हैं। हर दिन काम नहीं मिल पाने की कसक के बीच हर दिन बासी सूखी रोटी खाकर सुबह होते ही दिहाड़ी मजदूरी के लिए घर से निकल जाते हैं जो सुबह सात बजे तक रुदौली नगर के कुद्दूसी तिराहा पर लगने वाली मजदूर मंडी पहुंच जाते हैं। जहां मौजूद सैकड़ों मजदूरों की काम के अनुसार मजदूरी तय होती है। इनमें अधिकांश मजदूर भूमिहीन हैं। शुक्रवार की सुबह 8 बजे मजदूरों की मंडी में जाकर जब पड़ताल की तो उदास और हताश चेहरों ने अपनी बेबसी दिल खोल कर सामने रख दी। दिहाड़ी मजदूरी के रुदौली तहसील ही नहीं सोहावल व मिल्कीपुर तहसील क्षेत्र के सैकड़ो मजदूर काम की तलाश में यहां आते तो हैं लेकिन इन्हें यहां आने के बाद भी काम मिलेगा इस बात की गारंटी नहीं रहती है। यही कारण है कि दर्जनों मजदूरों व मकान बनाने वाले मिस्त्रियों को भी यहां से बैरंग घर की ओर लौटने को विवश होते हैं। कोरोना काल में इनकी संख्या कम हो रही है। दशहरे के वक्त बेहद गरीबी और लाचारी में जिंदगी जी रहे मजदूरों की हालत देखकर रोना आ जाता है। रोज काम भी मिल जाए तो भी परिवार का पेट भर पाना मुश्किल रहता है। वैसे ही चार महीने से अगर काम धंधा बंद हो तो इसकी पारिवारिक और मानसिक स्थिति क्या होगी इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। अगर इनके टूटे फूटे घरों के अन्दर त्योहार के मौसम में झांक कर देखे तो स्थिति बड़ी ही भयावह और डरावनी नजर आती है। इनकी हालत 4 माह में कुछ ज्यादा ही खराब हो गयी है। बाजार की अर्थव्यवस्था के साथ साथ मजदूरों की रीढ़ की हड्डी टूट गयी है। काम की तलाश में सुबह सुबह उमड़ने वाली मजदूरों की भीड़ तो वही है। नतीजतन उदास मन और खाली पेट लिए मजदूर घर लौट रहे हैं त्योहार के इस मौसम में भी मजदूर मंडी में मजदूरों की पहले जैसी मांग नहीं रही। जब पेट भरना मुश्किल हो तो त्योहार के उत्सव की कल्पना हीं बेमानी नजर आती है। मजदूरों के जीवन में मची हाहाकारी का शायद ही किसी के पास कोई जबाब हो? इनके बच्चें कैसे मनाएंगे दशहरा और दीवाली इसके बारे में सोचने और समझने का भला वक्त किसके पास है? इन मजदूरों में 90 प्रतिशत लोगों का लेबर कार्ड तक नहीं बना है। बहरहाल त्योहार के मौके पर मजदूरों की बेबसी पर ये कविता सटीक बैठती है कि भूख ने निचोड़ कर रख दिया जिन्हें, उनके तो हालात ना पूछो तो अच्छा, मजबूरी में जिनकी लाज लगी दावं पर, क्या लाई सौगात ना पूछो तो अच्छा।
…कहते हैं मजदूर :
सोहावल तहसील क्षेत्र के ग्राम पिरखौली के दीनानाथ, सौरी गांव के दिलीप कुमार, राधेश्याम, बहराए गांव के नन्कऊ, श्रीकृष्ण आदि सबके सब का एक ही रोना था कि चार महीनों से काम न मिलने से हम लोग भूखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं। समझ में नहीं आता है कि क्या करुं। बीस साल पूर्व जहां थे आज उससे भी बदतर हो गए हैं। थक हार कर रोटी के जुगाड़ में इतनी दूर आता हूं।
मिल्कीपुर तहसील क्षेत्र के नंदौली गांव के शोभनाथ, रामकिशोर, राजकुमार नौगवां के दुर्गादीन, हरीलाल कहते हैं गांव में काम न मिलने के कारण रुदौली नगर की ओर आना पड़ता है। सरकार ने रोजगार गारंटी योजना को लागू तो किया। लेकिन काम की गारंटी नहीं है। हद तो यह कि मनरेगा के तहत कार्य करने के बाद मजदूरी की राशि कब मिलेगी इस बात की गारंटी भी नहीं है।
रुदौली तहसील के ग्राम बनमऊ के कन्हैयालाल, सालिकराम, राजू, रामराज, गुटरु, सधारपुर के हीरालाल, खुस्का के पवनकुमार, अमहटा के भारत, पसिनपुरवा के राम कुमार, भर्रा के राज सुख, फत्तापुर के राम तिलक, जमुनिया मऊ के अमरनाथ आदि बताते हैं कि हम लोगों के बच्चें कैसे मनाएंगे दशहरा और दीपावली? बच्चों को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो पा रही है। गांव में मनरेगा योजना का काम भी नहीं मिलता है।
ग्राम मीरमऊ निवासी मो. अनीस, राजू, संजय कुमार, सल्लाहपुर मजरे भैसौली के शिवकैलाश, मांगीचांदपुर के शिवकुमार, भौली के बहरैची, सहजराम, जहानपुर के रामजीत सरकार की नीतियों को हीं मजदूरों की फटेहाली का प्रमुख कारण बताते हुए कहते है कि सरकार भी इसके लिए कम दोषी नहीं है। काफी दिनों तक ग्रामीण इलाकों में खाक छानता रहा। लेकिन आटा-चावल जुटाने भर की कमाई नहीं हो पाती थी। अब शहर में काफी मेहनत के बाद दो ढाई सौ रुपये दिहाड़ी जुट जाती है।
बारह माह दिहाड़ी की मजदूरी से जीने वाले अमराईगांव के मजदूर रोहित कुमार व सोहसा के धर्मेंद्र कुमार, बारी के तिलई, रामसागर, राजेश कुमार आदि कहते है कि गारा-मिट्टी का काम करता हूं लेकिन मुझे इस बात की पीड़ा है कि काम न मिलने पर भूखों मरने की नौबत आ गई है वापस दूसरे शहर लौटने को विवश हो गया हूं।
नगर के मोहल्ला पूरेमियां निवासी रंजीत कुमार, श्यामलाल, वर्मादीन, जावेद अहमद आदि बड़ी-बड़ी इमारत बनाने वाले मिस्त्रियों का कहना है कि
यहां काम की तलाश में आते हैं काम के लिए दोपहर तक काम की तलाश में बैठे रहते हैं। इस बात की उम्मीद रहती है कि यहां कोई न कोई ग्राहक आएगा और उसे काम देगा। आएदिन खाली हाथ ही वापस जाना पड़ता है। ऐसे में परिवार का पेट भरना संभव नहीं रहा।
…फ्री में मिलता था सुबह का भोजन :
नगर की लंगरे मुस्तफा संस्था द्वारा प्रतिदिन 5 सौ लोगों को सुबह के समय ताज़ा भोजन खिलाया जाता है जिसमें अधिकांश मजदूरों को फ्री में भोजन मिल जाता था भोजन करने के बाद मजदूर काम पर चले जाते थे। लेकिन लाक डाउन में बंद हो जाने से मजदूरों को अब वो भी नसीब नहीं हो रहा है।

Times Todays News

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