” सभ्यता एवं संस्कृति के सृजन में गुरुओं की भूमिका” ” सभ्यता एवं संस्कृति के सृजन में गुरुओं की भूमिका”
बौद्धिक एवं तार्किक शक्ति-सम्पदा सम्पन्न, विश्व प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ मानव प्राणी की सृजन शीलता असीम है।स्वस्थ व सुखद परिवेश में स्व अन्तः शक्तियों को... ” सभ्यता एवं संस्कृति के सृजन में गुरुओं की भूमिका”

बौद्धिक एवं तार्किक शक्ति-सम्पदा सम्पन्न, विश्व प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ मानव प्राणी की सृजन शीलता असीम है।स्वस्थ व सुखद परिवेश में स्व अन्तः शक्तियों को उद्दीप्त अथवा प्रदीप्त करने का मौका मिलने से मानव की विकास पथ पर पहुंच प्रबल हो जाती है।जिससे वह असाध्य को भी साध्य बना लेता है।अनेक आश्चर्यजनक, रोमांचकारी एवं रचनात्मक उपलब्धियां अर्जित करने वाला मानव अपने ज्ञान-गौरव के बदौलत जल, थल वायु एवं भूगर्भ के राज-रहस्यों को उद्घाटित कर दिया।
धरा की गोद में जीवन धारण कर स्व उत्पत्ति, विकास तथा अन्त की स्थितियों को प्राप्त होने वाले मानव सभ्यता एवं संस्कृति की गौरव-गाथा विचित्रताओं से भरपूर है। मनुष्य के मनुष्यता की परिपूर्णता अथवा उसकी अन्तः शक्तियों, संभावनाओं के प्रकटीकरण की परिस्थितियां, जिनके बदौलत मिलती हैं ,उनमें शिक्षक या गुरु का दर्जा सर्वोपरि है।जिनकी सानिध्यता में भगवान को भी परं सुख-शान्ति का रसास्वादन हुआ।यद्यपि मानव मनोवृत्तियां,जिज्ञासा-प्रवृत्तियां प्रकृति की प्रवृत्तियों से प्रभावित होकर या अन्तः क्रियाशील हो मानवोचित विकास की परिस्थितियों की शिक्षा से संयुत हुईं।इस अर्थ में प्राकृतिक उपागम उसके लिए सबसे प्रभावकारी भौतिक एवं आधारिक शिक्षक साबित हुए।दूसरे शब्दों में मानव प्रकृति तथा प्रकृति-प्रवृत्ति के अन्तर्योग एवं अंतर्क्रिया से प्रादुर्भूत ज्ञान-दान का कार्य प्रथमतः प्रकृति शिक्षक के माध्यम से प्राप्त करने वाला मानव स्व जीवन संदर्भ में गुरु की गरिमा की महत्ता से जबरदस्त रूप में भिज्ञ हुआ।यहीं से गुरु की आवश्यकता व श्रेष्ठता बढ़ी।
आत्म पक्ष की परं पक्षधरता से ओत-प्रोत हो,संरक्षित, संवर्द्धित प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग बीच मानव कल्याण के विचार- वृत्तियों से संपुष्ट,जो मनुष्य को मनुष्यता,मानवता के गुणों से संतुष्ट कर सके, उसके आत्म-पक्ष को मजबूत करते हुए महनीय व्यक्तित्व पद-प्रतिष्ठित कर सके साथ ही नाना मनोविकारों से रहित कर, अहंकार विमुक्त, सकारात्मक, समाजोपयोगी मूल्यों से पुष्ट करे ऐसे शिक्षक की कृपा-पात्रता की आवश्यकता मानव समाज को अनिवार्य रूप में हुई।निर्विकारी, निर्लोभी, दया, दान और त्याग के धनी, जिज्ञासु, ज्ञान-पिपासु, गुणों के अनुरागी जनों द्वारा कठिन तपोबल, श्रम-संकल्प साधना से गुरु की गुरुता प्राप्त करते हुए मानव समाज को सुन्दर-सुखद सभ्यता एवं संस्कृति का स्वाद चखाया गया।ऐसे परं त्यागी महागुरुओं, महापुरुषों के हम ऋणी हैं, जिनकी देनदारी मानव सभ्यता एवं संस्कृति के विकास पक्ष में असीम है।
भारतीय सभ्यता और संस्कृति की अमूल्यता,उसकी वैश्विक पक्ष में विशिष्टता कीतिहासिक वृत्तियां उन महापुरुषों, महर्षियों, जंगल में जीवन व्यतीत कर मानव हित साधना में सदा रत रहने वाले, साहित्य-साधना, समाज साधना क्षेत्र में मानवीय मूल्यों की बेहतरी की शिक्षा देने वाले,व्यापक रूप से शिक्षक की भूमिका अदा करने वाले विभूतियों के बदौलत ही हमारी संस्कृति की यह आवाज गगन गोचरित हो विश्व जनों की पिपासा को संतृप्त की कि -“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद दुःख भाग भवेत।।”
विश्व गुरु-गरिमा से संयुत भारतीय संस्कृति द्वारा ही वसुधैव कुटुम्बकम की वैश्विकता कासबक प्राचीन काल में ही शिक्षा संदर्भ में प्रतिष्ठापित कर मानव समाज को विश्व मानवता का पाठ पढ़ाया गया।आज इसी बुनियाद पर विश्व शांति संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ संस्थापित है।
सम्प्रति गुरु-गरिमा का स्व गुणों के अर्थ में लघिमा को प्राप्त होने का दुष्परिणाम विश्व मानव समाज नाना समस्याओं से ग्रसित हो और तनाव से बोझिल हो भोग रहा है।आज गुरु की गुरुता तथा शिष्य की शिष्यता दोनों विपथित है।मानव समाज की अपेक्षाएं भी देश-समाज के भावी कर्णधारों से प्रतिकूल भावधारा की ओर बहती जा रही है।परिणामतः आदर्श शिक्षकों, शिक्षार्थियों व अभिभावकों के बल पर आदर्श राष्ट्र -समाज सृजन का स्वप्न दिवा स्वप्न होता जा रहा है।
जब तक स्वस्थ शिक्षा समाज संस्थापना संदर्भ में हम सजग व सचेत नहीं होंगे, तब तक श्रेष्ठ नागरिकों की कोताही के खामियाजे को दूर कर पाना सम्भव नहीं।जरूरत इस बात की है कि शिक्षकत्व के गुणों से युक्त जनों को ही शिक्षा सेवा से जोड़ते हुए स्वस्थ शिक्षा परिवेश सृजित किया जाय और शिक्षा समाज को राज-समाज द्वारा स्वार्थ साधना का शिकार न बनाया जाय।ऐसे में ही शैक्षिक गुणवत्ता की गणित को सहजता से हल किया जा सकता है।

              ----सुरेश लाल श्रीवास्तव-----
                             प्रधानचार्य
                    राजकीय इण्टर कालेज
                  अकबरपुर, अम्बेडकरनगर
                       उत्तर प्रदेश-224122
                 मोबाइल नंबर-9455141000

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