जर से जर्जर हो गयी,अब रिश्तों की डोर जर से जर्जर हो गयी,अब रिश्तों की डोर
जर से जर्जर हो गयी,अब रिश्तों की डोर।तनातनी   अरु दर्प में,नेह हुआ  कमजोर।।बरगद सा सब देखता,विवश बना सरदार।आज पुरानी चीज की,कहाँ  रही दरकार।।बने  आधुनिक ... जर से जर्जर हो गयी,अब रिश्तों की डोर

जर से जर्जर हो गयी,अब रिश्तों की डोर।तनातनी   अरु दर्प में,नेह हुआ  कमजोर।।
बरगद सा सब देखता,विवश बना सरदार।आज पुरानी चीज की,कहाँ  रही दरकार।।
बने  आधुनिक  घूमते,क्षमा  दया से हीन।मूल्यों के अवमूल्य से,मनुज बना यूँ दीन।।
साली से ससुराल तक,रमता मन सौ बार।भाई   से कब  बात हो,खोज  रहे इतवार।।
जहां बड़प्पन अर्थ का,व्यर्थ वहाँ पर वास।मुक्ति  फकीरी  में बसे,अर्थ   बनाये  दास।।
शिक्षा बनी उपाधि जब,नैतिकता को छोड़।उल्टी  धारा  तब   बही,समरसता को तोड़।।-

उदयराज मिश्र

Times Todays News

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