असमंजस तथा दुविधा की स्थिति असमंजस तथा दुविधा की स्थिति
तमसो मा ज्योतिर्गमय के उद्घोष के साथ वसुधैव कुटुम्बकम के मूलमंत्र को शिरोधार्य कर ज्ञानराशि के अजस्र प्रवाह सी बहकर जनजन के मन,मस्तिष्क और... असमंजस तथा दुविधा की स्थिति

तमसो मा ज्योतिर्गमय के उद्घोष के साथ वसुधैव कुटुम्बकम के मूलमंत्र को शिरोधार्य कर ज्ञानराशि के अजस्र प्रवाह सी बहकर जनजन के मन,मस्तिष्क और आत्मा में विद्यमान अंतर्निहित शक्तियों को प्रस्फुटित करने वाली शिक्षा आज संक्रमण के दौर में अधिकारियों की किंकर्तव्यविमूढ़ता तथा नीतिनिर्माताओं के कागजी फेर में फंसकर मानो कागजी घोड़ों की रेस में पिछड़ती ही जा रही है।परिणामस्वरूप जहां एकओर शालाओं के पट बन्द या खुलकर भी बन्दप्राय से हैं वहीं अपने अपने घरों में ऊब रहे विद्यार्थियों में अबतक सरकार द्वारा किसी ठोस उपाय न किये जाने से अपने भविष्य को लेकर असमंजस तथा दुविधा की स्थिति खड़ी हो गयी है।जिससे विद्यार्थियों का जहां शैक्षिक ह्रास होता जा रहा है वहीं उनकी मानसिक अवस्था भी दिनोदिन असामान्य होती जा रही है।कदाचित कोरोना संक्रमण की मार से अगर कोई सर्वाधिक प्रभावित हुआ है तो श्रमिकों से भी अधिक मानसिक दंश विद्यार्थियों, अभिभावकों तथा शिक्षकों को सहना पड़ रहा है।   समालोचनात्मक रूप से यदि देखा जाये तो आधे मार्च से अबतक चार महीनों से अधिक समय गुजरने के बावजूद विद्यालयों के संचालन और शिक्षण -अधिगम को पुनः पूर्ववत पटरी पर लाने के बाबत न तो सरकार द्वारा कोई ठोस उपाय व्यवहृत किये गए हैं और न सम्बन्धित अधिकारियों द्वारा इस सम्बंध में शिक्षाशास्त्र विशारदों से विचार ही आमंत्रित किये गए।फलतः ऑनलाइन शिक्षण के कागजी घोड़े बढ़चढ़कर पढ़ और पढा रहे हैं,जबकि वास्तविकता बिल्कुल अलग है।अब प्रश्न यह उठना अवश्यम्भावी है कि आखिर झूठमूठ के कागजी आंकड़ों से किस प्रकार हकीकत में सच्चाई का सामना किया जा सकता है?कदाचित इसके उत्तर में केवल मौन ही वस्तुस्थिति का परिचय कराने को लेकर पर्याप्त हैं।    विद्यालयों को खोलने,संचालित करने के आदेश देना देखने में जितने आसान लगते हैं,वास्तव में वे उतने ही जटिल हैं।अभीतक एक भी विद्यालय का सेनेटाइजेशन न कराया जाना,थर्मल स्क्रीनर का प्रबंध न होना तथा विद्यार्थियों के रोस्टर वाइज आने आदि विषयों पर  चिंतन भी गर्भ में हैं।जिससे स्थिति दिनोदिन विस्फोटक होती जा रही है।महत्त्वपूर्ण तथ्य तो ये है कि इस कोरोना संक्रमण काल में सरकार केवल और केवल तदर्थ शिक्षकों के जहां पीछे पड़ी दिख रही है वहीं अन्य सभी शिक्षकों की गहन जांच भी कराई जा रही है।स्थिति यहीं नहीं ठहर रही है बल्कि प्रतिदिन सूचना संकलन के प्रारूपों में परिवर्तन होने से विद्यालयों को मांगी गयीं सूचनाओं को उपलब्ध कराने में ही अपनी सम्पूर्ण मानव शक्ति के साथ ऊर्जा को लगानी पड़ रही है।जिससे विद्यालय प्रबंधन कोरोना संक्रमण से बचाव के अन्य उपायों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर ही नहीं पा रहे हैं।लिहाज़ा प्रबन्धन से लेकर प्रशासक तक,विद्यार्थियों से लेकर शिक्षकों तक सभी के सभी शिक्षा के बाबत पूँछे जाने वाले प्रश्नों पर मौन ही हैं या स्वयम को कुछ कहने की स्थिति में नहीं पा रहे।जिससे उहापोह का वातावरण बढ़ने से विद्यार्थियों में मानसिक दबाव पड़ने से चिड़चिड़ापन आदि बढ़ता दिख रहा है।

-उदयराज मिश्र

Times Todays News

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