…..मनुष्य अभी भी  संभल जा …..मनुष्य अभी भी  संभल जा
इन्द्र नारायण तिवारी  सादर अभिवादन, आज का विषय है:– *इंसान सुन रहा है ना तू*?  . …रथ के पहिये थम गये हैं। मुनादी हो चुकी... …..मनुष्य अभी भी  संभल जा

इन्द्र नारायण तिवारी 

सादर अभिवादन, आज का विषय है:– *इंसान सुन रहा है ना तू*?  . …रथ के पहिये थम गये हैं। मुनादी हो चुकी है कि जो जहाँ हैं वहीं रुक जाएं। एक भयंकर जीव मानवता को निगलने निकल पड़ा है, उसके रास्ते में जो कोई आएगा, उसका काल बन जाएगा! सारे रास्ते सुनसान हो चले हैं। जिसे जीवन का जितना मोह है, उतना ही वे सारे लोग घरों में दुबक चुके हैं। जो जीवन को खेल समझते हैं वे अभी भी धर्म समुदाय का राग अलाप रहें हैं।लुका छिपी का खेल खेल रहे हैं।  मित्रो,आज एक सवाल आया मन में ! यह वायरस अकेले मनुष्य पर ही आक्रमण क्यों कर रहा है ? लाखों पशु हैं, पक्षी हैं लेकिन सभी तो घूम रहे हैं। ना साइबेरिया से आने वाले पक्षी रुके हैं और ना ही पड़ोस के पशु रुके हैं ! परन्तु मनुष्य के अलावा किसी मे कोई भय व्याप्त नहीं है।  *आखिरअकेला मनुष्य ही क्यों इन सूक्ष्मजीवियों के गुस्से का शिकार बना है?*  मनुष्य कभी भी किसी भी प्राणी को हाथ में पकड़ लेता है और अट्टहास करता है-तुझे निगल जाऊँगा….. हा हा हा। निरीह प्राणी बेचारा कुछ नहीं बोल पाता, लेकिन उसका आक्रोश जन्म लेता है, छोटे से सूक्ष्मजीवी के रूप में ! मनुष्य ने किसी भी प्राणी को नहीं छोड़ा, सभी के साथ दुर्व्यहार किया। लिहाज़ा ,सूक्ष्मजीवी बढ़ते गये और मनुष्य का जीवन संकट में घिरता गया। परिणामस्वरूप आज प्रायः अधिकांश घर में खाने की टेबल पर सज गये हैं जीव !  आक्रोश बढ़ता चला गया और सूक्ष्मजीवी पनपते गये। आज एक तरफ मनुष्य खड़ा है और दूसरी तरफ सृष्टि के समस्त जीव। मानो संग्राम छिड़ गया हो। मनुष्य को दम्भ है स्वयं को सबसे शक्तिशाली और बुद्धजीवी होने का।उसके पास न जाने कितने हथियार हैं लेकिन सूक्ष्मजीवियों के पास केवल स्वयं की ताकत है।  “सुबह हुई है। मुंडेर पर बैठकर चिड़िया गाना गा रही है, कोयल भी कुहकने को तैयार है, गाय रम्भा रही है लेकिन, मनुष्य.. खामोश बैठा घर में कैद है।” केवल चारों तरफ से सायं-सायं की आवाजें आ रही हैं।  आज शहर, कस्बा,गाँव सब के सब सन्नाटे में तब्दील हो रहे है। मानव ईर्ष्या, द्वेष, लालच,लोभ के आकंठ में युद्ध छेड़ रखा है, वह कह रहा है कि मेरे रंग में रंग जाओ नहीं तो बंदूक से भून डालूंगा। दूसरी तरफ सूक्ष्मजीवी आ खड़ा हुआ है। बंदूकें भी बैरक में लौट गयी हैं। परमाणु बम भी ख़ामोश है।मानवता को अपने ही रंग में रंगने वाले भी दुबक गये हैं, बस *सूक्ष्मजीवी घूम रहा है   निडर,निर्भय, निर्द्वन्द्व ! चेतावनी दे रहे हैं कोरोना जैसे हजारों सूक्ष्मजीवी। मनुष्य होश में आ जा, हिंसा छोड़ दे, नहीं तो तू सबसे पहले काल का ग्रास बनेगा। कोई नहीं बच पाएगा!* अट्टहास बदल गया है। सूक्ष्मजीवी का अट्टहास सुनायी नहीं पड़ता लेकिन जब मनुष्य का रुदन सुनाई देने लगे तब समझ लेना की कोई जीव अट्टहास कर रहा है।  पहिये थम रहे हैं लेकिन सूक्ष्मजीवी भ्रमण कर रहा है, भयंकर गर्जना के साथ दौड़ लगा रहा है। मनुष्य अभी भी सभल जा। कहीं ऐसा ना हो कि डायनासोर की तरह तू भी कल की बात हो जाए?*सुन रहा है ना तू* ?
  शायद आप सब हमारा भाव समझ गए होंगें !!   ✒️        *इन्द्र नारायण तिवारी*                *94500 42446*

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