विचारों एवं कर्मों की धारा पर निर्भर  है  भाग्य-विधाता बनना विचारों एवं कर्मों की धारा पर निर्भर  है  भाग्य-विधाता बनना
आत्मानुशासन की भूख को मिटाने का सुफल या आत्मानुशासन का मनोविज्ञान                       या आत्मानुशासन और आदर्श व्यक्तित्व,... विचारों एवं कर्मों की धारा पर निर्भर  है  भाग्य-विधाता बनना

आत्मानुशासन की भूख को मिटाने का सुफल या आत्मानुशासन का मनोविज्ञान                       या आत्मानुशासन और आदर्श व्यक्तित्व, स्व जीवन का भाग्य-विधाता बनना या विनाशक होना बहुत कुछ मानव के विचारों एवं कर्मों की धारा पर निर्भर करता है । उसके सारे प्रारब्ध उचित-अनुचित, अच्छा-बुरा, ग्राह्य-त्याज्य के तराजू पर तौल कर ही व्यवहरित होते हैं । इस भावधारा और कर्मधारा की पवित्रता, मूल्यपरकता , वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन स्तर पर स्वस्थ उपादेयता के लिए जरूरी है कि व्यक्ति में सद् विचार एवं सद् निर्णय की क्षमता हो , जिसका कि प्रयोग करके वह अपने जीवन के प्रत्येक आयाम को लहलहा सके। व्यापार हो या खेती-किसानी, शासन क्षेत्र हो या प्रशासन क्षेत्र, कर्मों के किसी भी क्षेत्र में बेहतर करते हुए, यदि आत्मा को सन्तुष्टि के चौखट पर पहुँचाना है तथा परं तुष्टि की अनुभूति करनी है तो सबसे पहले जीवन की मूल इकाई परिवार में जीवन – निर्माण के आधारिक मौके पर आत्मा की आवाज को अनुशीलित करना होगा । जैसा कि सबल व्यक्तित्व सृजन के सभी संयोग परिवारी परिवेश में ही सुलभ होते हैं। यहाँ की प्राप्तियां ही आपकी पहचान नियत करती हैं , जो विचारों व कर्मों के समर क्षेत्र में आपको विजयश्री दिलाती हैं या फिर हार की अनुभूति ।            स्वस्थ उपयोगी एवं गुणी व्यक्तित्व हितार्थ जिन विचारों एवं कर्मों की संयोजनशीलता आवश्यक है तथा जिन मनोविकारों से दूर रहना है, वह ज्यादातर मामलों में सभी को पता है , यदि नही तो सत्संगति , महनीय जनों के जीवन-दर्शन तथा साधु जनों के  प्रवचनों के अनुशीलन से भिज्ञता का विषय बन सकता है।
           मन और आत्मा इन दो आवेगों से प्रचालित मानव जीवन व्यवहार कब किसके वशीभूत हो विचारशील व कर्मशील होगा , ज्यादातर इसी से उसके व्यक्तित्व का प्रकटन होता है। मन जहाँ हमें अस्थिरता विकारग्रस्तता एवं लोभ, मोह क्रोधादि दुर्विकारों की धारा में ले जाता है, वहीं आत्मा से विचारों व कर्मों की पवित्रता , सर्व आयामिक जीवनमूल्यता की पवित्र भावधारा प्रवाहित होती है, जिससे व्यक्ति स्वयं के प्रति परिवार व समाज के प्रति तथा विश्वमानवता के प्रति कर्तव्य-बोध से युत् हो, महनीय कार्यों का निष्पादक बनता है। इसलिए वास्तविक जीवनानन्दानुभूति हेतु आत्मानुशासन के भूख की तृप्ति आवश्यक है। इसी भूख को मिटाकर ही हम अपने जीवन को धन्य कर सकते हैं। आत्मानुशासन की मनोवैज्ञानिकता का बोध हो जाने तथा उसे अपने व्यवहार का विषय बनाकर ही व्यक्ति आदर्श व्यक्तित्व गुणों से पुष्ट होता है।                             

सुरेश लाल श्रीवास्तव 

प्रधानाचार्य राजकीय इण्टर कालेज अकबरपुर – अम्बेडकरनगर

Times Todays News

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