वर्तमान में गुरु पूर्णिमा की प्रासंगिकता वर्तमान में गुरु पूर्णिमा की प्रासंगिकता
गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर अपने गुरू को याद करना सिर्फ एक प्रयास मात्र है। सही बात तो यह है कि गुरु की... वर्तमान में गुरु पूर्णिमा की प्रासंगिकता


गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर अपने गुरू को याद करना सिर्फ एक प्रयास मात्र है। सही बात तो यह है कि गुरु की महिमा बताना सूरज को दीपक दिखाने के जैसा है।
व्यक्ति के जीवन में प्रथम गुरु माता-पिता होते हैं, जो हमारा पालन-पोषण करते हैं। प्रथम बार चलना, बोलना, भोजन करना तथा प्राथमिक स्तर पर बहुत सी बातों को सिखाते हैं।
      अतः माता-पिता का स्थान सर्वोपरि है, किन्तु जीवन का विकास सतत चलता रहे, उसके लिए हमें गुरु की आवश्यकता होती है। भावी जीवन का निर्माण गुरु द्वारा ही होता है।
      संस्कृत में ‘गु’ शब्द का अर्थ होता है ‘अंधकार’ (अज्ञान) एवं ‘रू’ शब्द का अर्थ होता है ‘प्रकाश’ (ज्ञान) अर्थात गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु शिष्य का सम्बन्ध सेतु के समान होता है। गुरु की महिमा बड़ी न्यारी होती है। इसलिए गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना गया है। गुरु के महत्व को कबीर दास जी ने अपने दोहे के माध्यम से प्रकट किया है।
गुरु गोबिन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँव
बलिहारी गुरु आपने, गोबिन्द दियो बताय।
      कई ऐसे गुरु हुए हैं जिन्होंने अपने शिष्य को इस प्रकार से शिक्षित किया है कि उनके शिष्यों ने राष्ट्र की धारा को ही बदल दिया है। यहाँ हम महर्षि बाल्मीकि जी (जिनका नाम रत्नाकर था) का उल्लेख करना चाहेंगे, जो अपने गुरु देवर्षि नारद की कृपा से रामायण जैसे महाकाव्य की रचना किये। इस प्रकार हृदय परिवर्तन हुआ कि-
उलटा नाम जपे जग जाना, बाल्मीकि भये ब्रह्म समाना।
      स्वामी विवेकानन्द जी को बचपन से परमात्मा को प्राप्त करने की चाह थी, उनकी यह इच्छा तभी पूरी हुई जब उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का आशीर्वाद मिला। 
      आज हमें भी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर अपने गुरु को याद करने का यह सुअवसर मिला है, जिनकी कृपा और आशीर्वाद से हमारे जीवन में प्रकाश ही प्रकाश है।
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।
डा. पूनम राय
वरिष्ठ समाज सेविका एवं
जिला संयोजिका: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, अम्बेडकरनगर

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