मृत्यु का सम्मान तो होना ही चाहिए। मृत्यु का सम्मान तो होना ही चाहिए।
बेसिक शिक्षा अधिकारी अयोध्या संतोष देव पांडेय द्वारा प्रस्तुत मानवीय संवेदनाओं के यथार्थ को झकझोरने वाला आलेख मृत्यु गंगाजल है, पाप पुण्य दोनों धो... मृत्यु का सम्मान तो होना ही चाहिए।

बेसिक शिक्षा अधिकारी अयोध्या संतोष देव पांडेय द्वारा प्रस्तुत मानवीय संवेदनाओं के यथार्थ को झकझोरने वाला आलेख

मृत्यु गंगाजल है, पाप पुण्य दोनों धो देती है। व्यक्ति का सम्मान हो न हो, मृत्यु का सम्मान होना ही चाहिए। बालक अभिमन्यु की मृत्यु पर दुर्योधन के सारे भाई भले नाच लें, दुर्योधन की मृत्यु पर पांडव नहीं नाचते… राम न रावण की मृत्यु पर अट्ठहास किये न मेघनाद की मृत्यु पर… यही तो भारत है।

हर उस व्यक्ति की मृत्यु का सम्मान होना चाहिए जो अपने रोल को सुंदरता से निभा कर गया हो। महत्वपूर्ण यह नहीं कि वह नायक का रोल कर रहा था या खलनायक का, महत्वपूर्ण यह है कि उसका अभिनय कैसा रहा। जीवन के रंगमंच का यही नियम है। यहाँ नायक और खलनायक दोनों का कद बराबर होता है।

मृतक से यदि आपका वैचारिक विरोध था, यदि आपको लगता है कि वह आपके विरोध में अपने हिस्से का खेल बहुत अच्छा खेल गया, तब भी उसका सम्मान होना चाहिए। वह आपका भले विरोधी हो, अपने खेमे का तो एक निष्ठावान सैनिक था न? उसकी निष्ठा का सम्मान होना चाहिए। सम्भव हो तो उससे अधिक निष्ठावान सैनिकों का अपने खेमे में सृजन कीजिये, पर उसकी मृत्यु का अपमान न कीजिये… विचारों का युद्ध तो चलता ही रहेगा। न धर्म रुकता है, न अधर्म… लोगों का अलग अलग समूह अपनी धार्मिक मान्यता को सही ठहराने के लिए जितने भी खेल कर ले, सच यह है कि न ईश्वर दो तरह का है, न ईश्वर का विधान… उसके नियम सबके लिए एक ही हैं। यहाँ से उस लोक में ले जाने वाला एम्बुलेंस एक ही होगा। है न? इस धरती पर विवाद कर सकने लायक असँख्य मुद्दे हैं, मृत्यु जैसे विषय पर विवाद क्या करना… सम्वेदना का दिखावा यदि आवश्यक नहीं, तो उसके विरोध का भी अर्थ नहीं है। वैसे भी, कुल मिला कर यह श्मशान वैराग्य ही है। अलविदा रोहित सरदाना ।

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