महिला सशक्तिकरण:अधिकार और कर्तव्य(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस) महिला सशक्तिकरण:अधिकार और कर्तव्य(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस)
-विषय अत्यंत विशद और भाव बहुत ही गूढ़ होने औरकि अनेक प्रकार के मत-मतांतर से अपनी अपनी भाषाएं,परिभाषाएं और उदाहरण दिए जाने याकि गढ़े... महिला सशक्तिकरण:अधिकार और कर्तव्य(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस)

-विषय अत्यंत विशद और भाव बहुत ही गूढ़ होने औरकि अनेक प्रकार के मत-मतांतर

से अपनी अपनी भाषाएं,परिभाषाएं और उदाहरण दिए जाने याकि गढ़े जाने के बावजूद महिला सशक्तिकरण के समग्र उपायों,उपागमों और साधनों तथा कृत प्रयासों पर सम्यक विवेचन आवश्यक है। यक्ष प्रश्न यह है कि सशक्तिकरण को परिभाषित कैसे किया जा सकता है?इसपर विद्वत समाज एकमत नहीं है औरकि होना भी नहीं चाहिए।हाँ, सकारात्मक उपायों का अनुशीलन और प्रलापों का परित्याग भी होना चाहिए।जहां तक सशक्तिकरण को परिभाषित करने का प्रश्न है तो विचारणीय बिंदु निम्नवत हैं-1-क्या शिक्षा सशक्तिकरण में सहायक है?2-क्या संस्कार और आचरण की शुद्धता तथा सांस्कृतिक जीवनमूल्यों से युक्त शिक्षा भी सशक्तिकरण में सहायक है?3-क्या पाश्चात्य पहनावों के बिना या बिना कम वस्त्रों को पहने सशक्तिकरण नहीं हो सकता?4-क्या बालिग होने पर घर-परिवार की इच्छाओं का अनादर करते हुए जीना सशक्तिकरण में सहायक है?5-क्या दृढ़ संकल्प के साथ सफलता की ऊंचाइयों को प्राप्त करना ही सशक्तिकरण है?6-क्या नौकरी या धन कमाए बिना महिलाएं सशक्त नहीं हो सकतीं?7-क्या सशक्तिकरण के लिए आधुनिक बनने और स्वच्छंद विचरण तथा आचरण आवश्यक है?8-क्या दिवसों का आयोजन किया जाना सशक्तिकरण में सहायक है?आदि आदि प्रश्न हैं-जिनपर चर्चा होनी ही चाहिए। वस्तुतः नारी,महिला,स्त्री जैसे शब्द एकदूसरे के पर्याय हैं किंतु शब्दभेद से सबमें कुछ न कुछ अंतर झलकता है।नारी शब्द एक जातिवाचक संज्ञा है।जिसमें सम्पूर्ण नारियां समाहित हैं ।जब कोई शिक्षित नारी स्त्रियोचित गणवेश में संस्कारों को वहन करती हुई सफलता के शिखर को छूती है या समाजसेवा,वकालत,शिक्षण आदि किसी समान्नित पेशे में जुड़ती है तो वह महिला कहलाती है।इसप्रकार महिला स्वयम में शिक्षित,सुसंस्कृत और सौम्य होने का बोध कराने वाला शब्द है।अंग्रेजी में भी स्त्री को woman और महिला को lady कहा जाता है।जैसे Indira Gandhi was a brave lady.यहां कभी भी lady की जगह woman नहीं आता।इसप्रकार महिला सशक्तिकरण तो वास्तव में नारी सशक्तिकरण का परिचायक है। जहां तक महिलाओं के शक्तिस्वरूपा होने और देवी होने की बात है तो हमारी भारतीय संस्कृति सदैव से स्त्रियों को देवी स्वरूपा मानती रही है।यहां अविवाहित कन्याओं को साक्षात दुर्गा माना जाता है।पाणिग्रहण के समय स्वयम मातापिता अपनी पुत्री का कन्यादान करने से पूर्व चरण प्रक्षालन करते हैं।जिससे स्प्ष्ट है कि महिलाएं भारत के परिप्रेक्ष्य में कभी किसी की मोहताज नहीं रहीं।आदि शंकर ने स्वयम लिखा है कि-या देवी सर्व भूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः।।रामचरित मानस में महात्मा तुलसी जी स्त्रियों की महत्ता और स्थिति का सुंदर वर्णन करते हुए लिखते हैं-सीयराममय सब जग जानी।करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी।।मंगल भवन अमंगल हारी।उमा सहित जेहि जपत पुरारी।। शास्त्रों में यहां तक लिखा है कि-यत्र नार्यस्तु पूजन्ते रमन्ते तत्र देवता। तुलसी जी यहां तक लिखते हैं कि-धीरज धरम मित्र अरु नारी।आपद काल परखिये चारी।। यहां भी संकट के समय नारियों की भूमिका अतिमहत्त्वपूर्ण है।जिससे स्प्ष्ट है कि नारियां कभी भी पुरुषों से कमतर या कमजोर नहीं रहीं हैं।हां, देश काल परिस्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित यही जरूर हुई हैं।जो कि विचारणीय है।सती प्रथा का अंत होना,तीन तलाक और अन्य प्रथाओं पर बंदिश अत्यंत स्वागतयोग्य हैं।कदाचित ऐसी सभी प्रथाएं चाहे वे हलाला हों या फिर कोई,उनका उन्मूलन होना ही चाहिये। यहां ये भी दृष्टव्य है कि बिना संस्कार,बिना गुण और बिना कर्तव्यपालन सीधे सशक्तिकरण न तो हो सकता है और न सम्भव ही है।आधुनिकता के नाम पर स्वच्छन्दता और मनमर्जी कभी भी सशक्तिकरण का साधन नहीं हो सकता।महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए आवश्यक है कि माताएं भी पुत्रों और पुत्रियों में विभेद करना बंद करें,समाज मे सकारात्मक सोच उत्तपन्न हो।किन्तु महिलाओं को ही आगे आना होगा।अपनी माँ से प्यार और सास से तकरार सशक्तिकरण का हेतु नहीं हो सकता।सम्यक आचरण,उच्च शिक्षा,अपनी सांस्कृतिक विरासत का अनुशीलन और आदर्शजीवन जीते हुए धन कमाना और दूसरों के लिए प्रतिमान बनना ही सशक्तिकरण का स्थायीकरण हो सकता है।

-उदयराज मिश्रअध्यक्ष,

माध्यमिक शिक्षक संघ,अम्बेडकर नगर

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