जरुरत से जिद की तरफ जाता किसान आंदोलन जरुरत से जिद की तरफ जाता किसान आंदोलन
२०१६ में सरकार का कहना की २०२२ तक किसानो की आमदनी दूनी करेंगे परन्तु कैसे इसका कोई भी विवरण आज तक नहीं मिलता अब... जरुरत से जिद की तरफ जाता किसान आंदोलन


२०१६ में सरकार का कहना की २०२२ तक किसानो की आमदनी दूनी करेंगे परन्तु कैसे इसका कोई भी विवरण आज तक नहीं मिलता अब सरकार का कहना है की उसके ये तीन बिल किसान को अपनी फसल कही भी बेचने की आज़ादी देंगे । जबकि किसान पहले भी हिमांचल के सेब आदि पुरे देश में खुले रूप में बिक रहे है । जहा तक मनचाहा रेट बेचने की बात है तो सपने बेचने की मार्केटिंग के अलावा कुछ भी नहीं है क्योकि खेती में आमदनी का स्वरुप इतना ज्यादा जटिल है की उसे बेचना किसान की मज़बूरी बन जाती है और संभवतः विवस्ता की इसी बिक्री को ध्यान में रखकर ही पुरे विश्व ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की शुरआत की होगी । अब किसानो को यह भय लग रहा है की सरकार अपने आर्थिक सलाहकारों और बड़े पुजीपतियो के दबाव में न्यूनतम समर्थन मूल्य की जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाना चाहती है सरकार को ये सुनिश्चित करना होगा की न्यूनतन समर्थन मूल्य किसान का वैधानिक अधिकार बने । खेती की लागत का फार्मूला उद्योग की लागत के फार्मूले की तरह निर्धारित हो ।
संविदा खेती से उपजे विवादों को हल करने के लिए किसान आयोग अनिवार्य रूप से बनाया जाय जिसमे ब्लॉक जिले एवं राज्य स्तर पर ट्रिब्यूनल बनाया जाय उसमे कार्य करने वालो की जिम्मेदारी तथा समय सीमा तय की जाय ऐसा न करने पर दंड का प्रावधान किया जाय मेरेविचार से अगर ये सब कर िया जाय तो भारतीय कृषि केवल अपने बल पर ही देश को विश्व की अग्रणी आर्थिक शक्ति बनासकती है । मगर ऐसा लगता है आंदोलित किसानो ने बातचीत के दरवाजे ही बंद कर दिए है । यह किसी भी लोकतान्त्रिक देश में संभव नहीं यदि इस मोड पर कानून वापस लिया जाता है ो संसद द्वारा पारित कानूनों के िरोध की प्रवृत्ति को बढ़ावा देगा और भविष्य में आंदोलन की इसी तरह की प्रक्रिया को अपनाकर सुधार और विकास की रह में ोडा डालाजायेगा ।
मेरे विचार से केंद्र सरकार को अब इसे सभी राज्य सरकारों को ब्यापक विमर्श के लिए एडवाइजरी जारी करके खरीददारों के िये एम् इस पी पे खरीदना अनियार्य किया जाय और यदि किसान रिपोर्ट करता है ो कठोर कार्यवाही की जाय । केंद्र एवं राज्य का हिस्सा निर्धारित करके एम् इस पी और खरीद प्रबंध के साथ साथ पूरी दंड प्रक्रिया को राज्य सरकारों को सौप देना चाहिए ।मुझे उम्मीद है इससे हल निकल सकता है क्योकि किसान आंदोलन अब जरुरत से ज्यादा जिद की तरफ बढ़ता दिख रहा है ।

राज्य सरकारों के सहभागिता के आभाव में इस में कोई बड़ा परिवर्तन लाना संभव नहीं है क्योकि प्रथम दृष्ट्या छोटे किसानो के लिए तो ये बिल बहुत ही लाभदायी होंगे अगर अनुबंध खेती सफल होती है तो निश्चित रूप में कृषि छेत्र में शामिल अतिरिक्त मानव संसाधन कोई अतिरिक्त कार्य करेगा जिससे उसका तथा देश दोनों का आर्थिक विकास होगा साथ साथ कृषि छेत्र में विशेष लोगो के आने से नयी नयी तकनीकी आएगी और उसकी भी उत्पादकता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा क्योकि वैसे भी छोटे किसान एम् अस पी आदि का लाभ लेने से वंचित ही है समस्या सिर्फ बड़े किसानो की है जो की न्यूनतम समर्थन मूल्य का पूरा फायदा ले रहे है सरकार को दोनों पहलुओ पे ध्यान देना है क्योकि आज की ब्यवस्था में गेहू पर समर्थन मूल्य के नाम पर आने वाले पैसे का ६५: केवल पंजाब पा रहा है जबकि पंजाब के किसान बाकि राज्यों के किसानो से ज्यादा संपन्न है । सायद यही कारन है की ये आंदोलन बाकि राज्यों में प्रभावी नहीं है । छोटे किसानो को जब हम ऍफ़ पी ो आदि के द्वारा संगठित कर जायेगे तभी उनके बारे में कुछ बड़ी ोजनाए बनाई जा ाकेगी । आशा है की सरकार पूर्व से ब्याप्त इस असमानता की दरार को ध्यान में रखते हुए निर्र्णय सिर्फ और सिर्फ बड़े और संपन्न किसानो को ही ध्यान में रखकर नहीं लेगी ण्
मनोज सिंह
सामाजिक कार्यकर्ता
9919647231

Times Todays News

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